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बहुमुखी प्रतिभा के धनी-युग दृष्टाः-रवीन्द्रनाथ टैगोर

rabindranath tagore

कोई 90 -100 साल के संघर्ष के बाद हमें आजादी मिली। इस अवधि में विभिन्न वर्गों और धर्मों से जुड़े अनेक देशवासियों ने त्याग किया, बलिदान दिया, संघर्ष किया, नेतृत्व किया और स्वतंत्रता की नीवं रखी। उन्हीं महान विभूतियों में अग्रणी रहे गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर। जब देश में तीरंगा षिखर चुम रहा था प्रकट रुप से टैगोर जीवित नहीं थे, परन्तु उनके सार्थक और सामूहिक प्रयास साकार हो उठे थे ।

ब्रिटीश सामराज्य के अधिन बंगाल के कोलकाता (कलकत्ता) के जोड़ासां ठाकुर वाड़ी में 7 मई 1861 को प्रतिष्ठित श्री देवेन्द्रनाथ टैगोर और श्रीमती शारदादेवी के यहां जन्मे रवीन्द्रनाथ की आरंभिक शिक्षा सेन्ट जेवियर स्कूल में हुई, उपरान्त वकालात की अधूरी शिक्षा छोड़कर वे देशहित में चिन्तन करते हुए सक्रिय हो गये। बंगाली और अंग्रेजी भाषा पर आपका अधिकार रहा। विभिन्न सृजनात्मक विद्याओं में निपुण रवीन्द्रनाथ टैगोर का निधन सन् 1941 में हो गया ।

80 वर्षीय आकर्षक व्यक्तित्व और विशाल कद काठी के श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर को चिन्तनशील गहनता के लिये ‘‘गुरुदेव‘‘ के नाम सम्मान से जाना जाता रहा। भारत के गौरव पुरुष श्री टैगोर को विश्व साहित्य में अतुलनीय योगदान के लिये प्रतिष्ठित ‘‘नोबेल साहित्य पुरस्कार‘‘ से सम्मानित किया गया। सन् 1910 में लिखी कृति ‘‘गीतांजलि‘‘ के लिये सन् 1913 में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। आप सम्पूर्ण एशिया महाद्वीप से यह साहित्य सम्मान प्राप्त करने वाले प्रथम व्यक्तित्व रहे।

158 वर्ष पूर्व भारत की धरती पर जन्मे गुरुदेव टेगोर को आज भी देशवासी आदर और श्रद्धा से स्मरण करते है। भले ही वे सम्पूर्ण आजादी के पूर्व महाप्रयाण कर गये पर स्वतंत्रता का शंखनाद और तत्कालीन पीढ़ी के साथ नेतृत्व किया। हिन्दु धर्म के अनुयायी गुरुदेव टैगोर की विश्वव्यापी प्रतिष्ठा रही। महात्मा गांधी, पं.मदनमोहन मालवीय, स्वामी विवेकानन्द, विनोबाभावे आदि के अलावा मैक्सिम गौर्की, लियो टाल्स टॉय, विलियम षेक्सपियर, आदि से भी जुड़ाव रहा ।

बंग्ला साहित्य के माध्यम से आपने भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नई उर्जा प्रवाहित की। युग दृष्टा गुरुदेव टैगोर ने कालजयी रचनाओं का सृजन किया। विश्वस्तरीय कविताएं, इतिहास, खगोल विज्ञान, आधुनिक विज्ञान, संस्कृत अध्ययन, महाकवि कालीदास की शास्त्रीय कविताओं का सु़क्ष्म विवेचन और अध्ययन करते हुए तत्कालीन साहित्यिक आंदोलन ‘‘आधुनिकतावाद‘‘ के प्रणेता रहे। आपने हिमालय पर्वतीय स्थल प्रकृति की गोद में रहकर चिंतन-मनन किया । प्राकृतिक विधाओं में दक्षता के साथ ‘‘रवीन्द्र संगीत‘‘ सृजन किया। नाटककार, साहित्यकार, निबंधकार, कहानीकार, चित्रकार सहित अनेक क्षेत्रों में स्थापित हस्ताक्षर बन कर उभरे और स्थापित हुए।

बहुमुखी प्रतिभावान गुरुदेव टैगोर ने शिक्षा के क्षेत्र में अभिनव नवाचार परतंत्र भारत में किया। शांति निकेतन गुरुकुल की स्थापना कराई। गुरुदेव टेगोर का मानना था कि प्रकृति और सामाजिक सन्दर्भ से दूर न हो शिक्षा। शिक्षण व्यवस्था में सुधार का सुझाव देते हुए वर्तमान पर अफसोस जताया कि यह पुस्तकों की गुलामी को प्रोत्साहित करती है। यह शैक्षणिक चिंतन की दृष्टि से आज भी प्रासंगिक है।

सृजनशील गुरुदेव टैगोर ने व्यक्ति की सकारात्मक स्वतंत्रता पर बल दिया। उनका स्पष्ट मत रहा कि सृष्टि ईश्वरीय लीला है। ऐसे में संसार से मुंह मोड़कर ईष्वर प्राप्ति के प्रयास व्यर्थ हैं। महासागर, सूर्य, चन्द्र, पर्वत, वन, घाटियां, नदियां, झंझावत, वायु,आकाश ये सब ईश्वरीय है, प्रकृति प्रदत्त और नैसर्गिक आनन्द की अभिव्यक्ति है और यह सभी एक सृजनशील चेतना के सामन्जस्य को मूर्त रुप प्रदान करती है। इसे झुठलाया नहीं जा सकता।

स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रज रहे गुरुदेव टैगोर अनुभव सिद्ध युग पुरुष रहे। वे कहते हैं विज्ञान भौतिक जगत का अध्ययन करता है। जबकि मानवमात्र प्रकृति के सौन्दर्य का आनन्द लेते हुए ही अपनी स्वतंत्रता का उपभोग कर सकता हैं, प्रकृति पर अंधा धुंध नियंत्रण स्थापित करके नहीं।

विचारों के साथ कर्तव्य रत रहे टैगोर का स्पष्ट मानना है कि स्वतंत्रता की मोजुदगी में ही शिक्षा को अर्थ और औचित्य प्राप्त हो सकता हैं। परतंत्र भारत में स्कुली शिक्षण मात्र ‘‘शिक्षा की फेक्ट्री‘‘ भर है जो बनावटी, रंगहीन दुनिया के सन्दर्भ से कटा हुआ सफेद दीवालों के बीच झांकती मृतक अांखों की पुतली समान है। नियम और स्वतंत्रता मनुष्य के अस्तित्व के दो रुप हैं। एक भौतिक अस्तित्व जो नियमों से बंधा है, दुसरा आध्यात्मिक अस्तित्व जो अन्य से पृथक और विलक्षण सिद्ध करता है।

गुरुदेव टैगोर ने बताया वैयक्तिकता मानवमात्र की अमूल्य निधि है जो उसके जीवन मूल्य उद्देश्य को निर्धारित करती है। विवेक पूर्ण आत्म निर्णय ही स्वतंत्रता का सारतत्व है। टैगोर को भाषाओं में नहीं बांधा जा सकता। उनका चिंतन सृजन सर्व जनहिताय रहा और मूलतः स्वतंत्रता का पक्षधर रहा। अनेक भाषाओं में उनकी कविताओं, कहानियों, नाटको, निबंधो, का अनुवाद हुआ है। जो विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर है।
गीतांजलि कृति के अलावा सर्वाधिक चर्चित कहानियां घर -बाहर, काबुलीवाला, चित्तजेथा -भय शुन्य, बीर पुरुष आदि पर नाटकों का मंचन भी किया गया हैं।

अमर कृति ‘‘गीतांजलि‘‘की पंक्तियां महान व्यक्तित्व को प्रकट करती हैं –
मन जहां डर से परे है – और, सिर जहां उंचा है।
ज्ञान जहां मुक्त है, और, जहां दुनिया को,
संकीर्ण घरेलु दीवारों से
छोटे -छोटे टुकड़ों, में बांटा नहीं गया है।।
जहां शब्द सच की गहराईयों से निकलते हैं

जहां थकी हुई प्रयासरत बाहें -त्रुटि हीनता की तलाश में हैं।
जहां कारण की स्पष्ट धारा हैं
जो सुनसान रेतीले मृत आदत के वीराने में
अपना रास्ता खो चुकी हैं।
जहां मन हमेशा व्यापक होते विचार और सक्रियता में
तुम्हारे जरिये आगे चलता है। और, आजादी के स्वर्ग में पहुंच जाता है।
ओ, पिता -मेरे देश को जागृत बनाओ ।।
प्रणम्य -महापुरुष को नमन।

डॉ. घनश्याम बटवाल, मंदसौर,

मो. 9425105959

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