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फिर तो नेहरू के आगे से पंडित और गांधी के आगे से महात्मा भी हटा दो !

veer sawarkar

कैसा लगेगा जब पंडित जवाहरलाल नेहरू के नाम के आगे से पंडित हटा दिया जावे, महात्मा गांधी के आगे से महात्मा हटा दिया जावे, महामना पंडित मदनमोहन मालवीय के आगे से महामना हटा दिया जावे और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के आगे से नेताजी हटा दिया जावे? तो फिर स्वातंत्रय वीर विनायक दामोदर सावरकर के नाम के आगे से वीर क्यों हटाया गया?

राजस्थान की अशोक गेहलोत के नेतृत्व की कांग्रेस सरकार ने अपने स्कूल पाठ्यक्रम में से वीर सावरकर के आगे लगी वीर की उपाधि हटा दी है। आधुनिक भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों के अप्रतिम योगदान से इतिहास भरा पडा है। तात्कालीन समय में हर भारतीय ने अपना योगदान अपनी क्षमताओं से परे जाकर दिया और भारत को स्वाधीन कराया।

तात्कालीन नेतृत्व में दो प्रकार के लोग थे जो स्वाधीन भारत के बाद का विचार अपने स्तर पर कर रहे थे इनमें कुछ लोगों का विचार था कि एक बार अंग्रेज देश छोडकर चले जाऐं उसके बाद हम एक नये भारत की रचना करेंगे लेकिन ऐसे लोगों के पास कोई वैचारिक अधिष्ठान नहीं था और ये केवल सत्ता प्राप्ति के बाद की सुख सुविधाऐं प्राप्त करना चाहते थे।

दूसरा पक्ष वह था जो इनसे विपरीत विचार रखता था जिनके लिये भारत मात्र भारत नहीं मातृभूमि थी और उसकी पराधीन अवस्था से मुक्ति के बाद वह उसके पुराने और गौरवशाली वैभव को कैसे प्राप्त कर सके उसका विचार कर रहे थे। सीधी भाषा में कह लें तो ये विशुद्ध राष्ट्रवादी विचार था जो भारत की प्राचीन विरासत के आधार पर दासता मुक्त भारत का भविष्य लिखना चाहता था।

स्वातंत्रय वीर विनायक दामोदर सावरकर इनमें से एक थे और भारत की सांस्कृतिक विरासत के आधार पर वैचारिक अधिष्ठान के मामले में इनका कोई सानी नहीं था। उनको यदि तात्कालीन समाज ने वीर की उपाधि से नवाजा था तो वे वास्तव में उसके हकदार थे। भारत ही नहीं विश्व के इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलेगा जिसे एक साथ दो कालापानी की सजा सुनाई गई हो। यहॉं हम ना तुलना करना चाहते है और किसी को नीचा दिखना चाहते है लेकिन इस बात को समझना जरूरी है कि यदि अंग्रेजो से मिली जेल की सजा और जेल में रहने समय के आधार पर देखें तो गांधी, नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद और ऐसे कुछ नाम और इनके साथ जोड दे तो ये सब मिलाकर जितने दिन जेल में रहे हैं उससे ज्यादा अकेले वीर सावरकर जेल में रहे हैं।

इतिहास के अध्ययनकर्ता यदि इस सम्बन्ध में मार्गदर्शन करेंगे तो उचित होगा कि पं.जवाहरलाल नेहरू पर कौन सी जेल में और कब कोडे बरसाए गए? महात्मा गांधी को उनकी जेल यात्रा में कब कोल्हू में जोत कर तेल निकलवाया गया? और बाकि तात्कालीन नेताओं ने सावरकर द्वारा झेली यातनाओं के मुकाबले में क्या सजाऐं झेलीं। अंदमान निकोबार की सेल्यूलर जेल भेजे जाने की सजा जिसे कालापानी की सजा कहा जाता था और यह आम तौर पर माना जाता था कि वहॉं से कोई जीवित लौटकर नहीं आता था ऐसी कालेपानी की सजा सावरकर को दी गई थी और इस कष्टमय सजा को उन्होने भोगा भी। आज अंदमान निकोबार द्वीप समूह और सेल्यूलर जेल भले ही पर्यटन का केन्द्र बन गए हों लेकिन वह भूमि और जेल भारत के शूरवीरों के रक्त से सनी है और हर भारतीय के लिये पूजनीय है।

आज कांग्रेस की सरकार विनायक दामोदर सावरकर उपाख्य वीर सावरकर के नाम के आगे से वीर हटाकर अपनी वीरता साबित करना चाहती है लेकिन इससे इतिहास के वो अजर अमर लेख कैसे बदल जाऐंगे जो वीर सावरकर ने अपने कर्तृत्व और लेखनी से इस भारत को दिए हैं। स्वातंत्रय वीर सावरकर की लिखी पुस्तक भारतीय इतिहास के छः स्वर्णिम पृष्ठ एक ऐसी पुस्तक है जो इतिहास में हुई हमारी भूलों के परिणामों को बताती हैं वहीं भविष्य में उन गलतियों की पुनरावृत्ति ना हो इसके लिये मार्गदर्शन भी करती है।

कांग्रेस के 50 सालों के शासनकाल में वैसे भी कम्यूनिस्ट इतिहासकारों ने भारत के अतिप्राचीन और वैभवशाली इतिहास के साथ छेडखानी करने में कोई कसर नहीं छोडी हे और जबकि कम्युनिस्ट विचारधारा और उनके लोग अब इस देश

से बिदा होने की स्थिति में आ गए हैं तो क्या कांगेस इतिहास के साथ छेडखानी करने की इस जिम्मेदारी को उठाने की तैयारी कर रही है? इतिहास के तथ्यों को छुपाया जा सकता है लेकिन बदला नहीं जा सकता और ऐसे किसी भी प्रयास की गंभीर आलोचना होनी चाहिये। स्वातंत्रय वीर विनायक दामोदर सावरकर जिन्हे भारत के इतिहास में वीर सावरकर के नाम से जाना जाता है वे अपनी अक्षय और अजर अमर कीर्ति के साथ भारतीय जनमानस के मानस पटल पर अिंकत हैं और हमेशा रहेंगे। देशभक्ति और राष्ट्रवादी विचार के प्रवाह को जिस तरह से सावरकर ने पल्लवित और पोषित किया वह आज वटवृक्ष बन गया है और उसमें उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। जिस दिन अंग्रेजों ने वीर सावरकर को दो दो 

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कालेपानी की सजा सुनाई थी तो उसी समय अदालत में वीर सावरकर ने कहा था कि क्या मेरी सजा पूरी होने तक अंग्रेजी शासन भारत में रहेगा? उनकी भविष्यवाणी सच हुई और अंग्रेजों को भारत छोडकर जाना पडा। ऐसे महामानव के नाम के आगे लगी वीर की उपाधि कांग्रेस को क्यों चुभ रही है? इसका जवाब तो भारतीय समाज मांगेगा ही सही लेकिन राजस्थान की कांगेस सरकार के इस कुत्सित निर्णय और काम की जितनी निंदा की जाए कम है।

– डॉ. क्षितिज पुरोहित, मंदसौर (म.प्र.)

9425105610

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