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सत्ता की दौड़ में पीछे रह गई प्रदेश की जनता..!

ये सत्ता का नशा और उसकी लालसा… कुर्सी का खेल और कुर्सी बचाने के पीछे के किस्से… कुछ छनी-छनाई बाते और कुछ सामने आते राजनीतिक हथकंडे…!!! यह सब हुआ बीते महीने मध्यप्रदेश में, ना जाने कितने गठजोड़ बिठाए गए अपनी-अपनी सत्ता बचाने के लिए… लेकिन इन सबके विपरीत पीछे रह गई तो प्रदेश की जनता और लोकतंत्र पर उनका विश्वास, हाल कुछ ऐसा हो गया की, कोरोना जैसी आपातकाल परिस्थिति के वक्त प्रदेश अपने नेतृत्वकर्ताओं के कारण ही बदहाल हो गया। ना किसी ने जनता की सुध ली और ना उन्हें किसानों से वास्ता रहा जो किसानों की दुहाई देकर सत्ता में काबिज होते है।

दुनिया के कई देश जब कोरोना से लड़ने की तैयारी में लगे थे, तो भारत का अपना ही मध्यप्रदेश था जहां कुर्सी की होड़ लगी थी। बीजेपी ने कांटा चुभाया तो बदला लेने में कांग्रेस भी पीछे ना रही। यह कोई एक किस्से की बात नहीं, बल्कि उस पूरे घटनाक्रम का एक सार है जिसमे प्रदेश की जनता से उनके चुने हुए जनप्रतिनिधियों ने ही आंखमिचौली का खेल- खेला… क्या- क्या नहीं हुआ!!! बैंगलोर, गुरुग्राम, दिल्ली, भोपाल, जयपुर… ना जाने कहाँ-कहाँ अपने-अपने दूतों को बचाने के लिए फलांगे लगवाई। प्राइवेट प्लेन, बसे, गाड़ियां कर खूब जनता के पैसों को पानी की तरह बहाया गया और अंत मे जुमला दिया गया कि प्रदेश की पूर्व सरकार अच्छा काम नहीं कर रही थी, जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रही थी… पूर्व सरकार ने भी इसमें स्वयं को पीछे नहीं रखा। सत्ता जाते ही उन्होंने तीखे हमले और सवाल उठाने शुरू कर दिए।

हास्यास्पद बात यह रही कि प्रदेश की जनता इस घटनाक्रम को पूर्ण लगाव से देख तो रही थी किन्तु शायद विचार नही किया… और किया भी तो शायद अगले चुनाव आते-आते सब कुछ भूल भी जाये। कुल मिलाकर इन सबके पीछे किसी को छकाया गया तो वह थी प्रदेश की जनता… जो नेताओ की सत्ता बचाने वाली दिमागी कसरत को समझ ही नही पाई… असल मे जिस वक्त तैयारियां कर कोरोना से लड़ना था। उस वक्त जनता के चुने हुए नेता जनता की सेवा की बजाए.. प्रदेश में स्वयं की सत्ता का बाजा-बजाने (यानि कि बिन्दौली निकालने पर तुले हुए थे।) सत्ता हाथ आते ही बीजेपी ने कोई कसर छोड़ी और तत्कालीन कांग्रेस सरकार की कोरोना को लेकर तैयारियों पर घेरना शुरू किया… सत्ता जाते ही तिलमिलाई कांग्रेस भी चारो तरफ से हमलावर हुई… इस फैशन ने दौर में फिर शुरू हुआ ट्वीटर वार.. जहां एक-दूसरे पर जमकर हमले हुए…और इस राजनीतिक वार का खामियाजा प्रदेश अब इंदौर, भोपाल, उज्जैन और प्रदेश के कई जिलों से सामने आ रहे कोरोना मामलों के रूप मे भुगत रहा है।

हाल ये रहा कि आनन-फानन में फिर से सीएम बने शिवराज सिंह चौहान भी शायद इतने लंबे घटनाक्रम में यह निर्णय नही ले पाए कि आने वाले वक्त में मंत्री किन्हें बनाना है ? यहां तक कि मेडिकल इमरजेंसी के वक्त में भी बिना स्वास्थ्य मंत्री के करीब एक माह तक “वन मैन आर्मी” बने रहे। अब मंगलवार को कुछ गिने-चुने मंत्री प्रदेश की बागडोर संभालने के लिए सेनापति स्वरूप खड़े तो किये गए है। किन्तु कोरोना जैसी महामारी के दौरान यह कितना मंगल करते है। यह आने वाले दिनों में ही जनता के सामने साफ हो जाएगा।

बस आने वाले वक्त में अब जनता को अपनी आंखों पर लगे प्रिय राजनीतिक पार्टी के चश्मे को हटाकर… सही और गलत की समझ के साथ अपना नेता चुनने की आवश्यकता है। क्योंकि बीते महीने हुए प्रदेश के घटनाक्रम को देखकर अगर स्वयं के मन से सवाल किया जाए तो जरूर दोनों ही पार्टी के नेताओं के लिए आपके मन में कई तरह के सवाल जन्म लेंगे!!! जिसका जवाब आप चाहे तो होने वाले चुनावों में दे सकते है।

लेखकः
प्रीत शर्मा, संवाददाता,
पंजाब केसरी टीवी, मंदसौर

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