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मजदूर है….या मजबूर है

बड़े ही विचित्र आज देश की हालत देखने को मिल रही है। इस देश का मजदूर…. वो मजदूर जिसने कई लोगो को आशियाने दिये है रहने को, कई नव निर्माण शहर बनाये, कई गगनचुंबी इमारतें बनाई, कई सारे मॉल बना कर कईयों को स्थाई रोजग़ार करने को जगह दी, कई सेठो के फैक्टरी में अपना पसीना बहाकर उनको नगर सेठ बनाया, और कुछ लालचियों को वोट देकर नेता बनाया वो मजदूर…. आज मजबुर है ।

कहां से व्यथा लिखू देश नवनिर्माण की, याद है स्कूल की कक्षा 10वी हिंदी का पहला पाठ “मै मजदूर हूं” इसको पढ़कर भूल गए और ज़िन्दगी की आपाधापी में हम बहुत आगे निकल गए। इस देश की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को संभालने में भले ही मजदूर का हाथ होता है पर उस मजदूर की मेहनत जैसे बड़ी-बड़ी इमारत के नीचे नींव जैसे दफन हो जाती है ।

देश मे कोरोना जैसी महामारी से अनभिज्ञ रहता हुआ मजदूर सिर्फ सुबह उठकर अपने काम में व्यस्त था। उसको सिर्फ दो जून की रोटी की चिंता और परिवार का पेट पालना ही याद रहता है। इस बीच भारत कों कोरोना रूपी महामारी घेर रही थी और जिम़्मेदार इससे अनभिज्ञ होकर देश की महान शक्ति के भारत आने के स्वागत में लगा हुआ था ।

इस देश को सुचारू रूप से चलाने वाले शीर्ष मजदूर की अनदेखी करते हुये लॉकडाउन का ऐलान करते हुए हमें तो कोरोना से बचा लिया पर वो मजदूर जिसका देश के निर्माण में बड़ा सहयोग था वो सड़क पर दर-दर भटकने को मजबूर हो गया। बड़ी ही मार्मिक घटना घटी होगी जब अधिक थकान और नींद और जल्दी घर जाने की जद्दोजहद में मजदूर इस आशय से पटरी पर सो गए होंगे कि रेल आएगी, रुकेगी, और रेल का परिचालक उनको उठाकर उनके घर तक ले जाएगा। इस आशा के साथ पटरी पर सोये और हमेशा के लिये चिर निंद्रा के लिये सो गए !

इसके बाद भी देश के मजदूरों से मजाक ख़त्म नही हो रहा है। इस देश के मजदूर के पास पहनने को कपड़े तक नही है ऐसे में हुक्मरान अपने वातानुकूलित ऑफिस में बैठकर योजना लाते है कि यदि मजदूर अपने घर जाना चाहता है तो ऑनलाइन फॉर्म भर सकता है यदि मेरे देश का मजदूर आज शिक्षित होता तो मजबूर नही होता ।

लेखकः
धीरेन्द्र कदम
मंदसौर (म.प्र.)

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