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भारत की जय जय !

संस्कृत दिन- इंदिराजी के प्रधानमंत्री रहते श्रावण पूर्णिमा को संस्कृत दिन घोषित किया गया था। तब से स्मरण पूर्वक संस्कृत भारती इसे मनाती है। साथ में कुछ शैक्षिक संस्थान भी आयोजन में सक्रिया रहते है। किन्तु बौद्धिक एवं सामाजिक संस्थान जैसा अपेक्षित है वैसा आयोजन नहीं करते। इस उपेक्षा के कारण भी है। उन्हें भारतीय अस्मिता के बिंदुओं का बोध नहीं है। प्रगति के मापदंडों में वे भौतिकता को ही स्थान देते है, कारण वे पश्चिम की तुलना भारत से करते रहते है। जो राष्ट्र विश्व में प्राचीनतम है और सर्वथा पृथक पहचान लेकर जीवित रहा है उसे जिनका राष्ट्र जीवन अत्यल्प है उनके मापदंडों पर स्वयं को कसना पड़े यह तो दु:खद ही है।

भारतीय अस्मिता

भारत में ऐसा क्या है जो अन्यों से हमें विशिष्ट बनाता है ? हमारे आदर्श भिन्न है। जीवन को देखने का दृष्टिकोण भिन्न है। संस्कार भिन्न होने के कारण संस्कृति भिन्न है। हम ज्ञान के उपासक है। धर्म हमारे जीवन का केंद्र बिंदु है। कृपया ज्ञान को knowledge और धर्म को religion न समझे। हम भारत को अंग्रजी में समझने का प्रयत्न न करें। भारतीय पारिभाषिक शब्दावली के अनुसार नश्वर जगत से सम्बन्धित बोध को अविद्या कहते है और शाश्वत से सम्बन्धित बोध को विद्या या ज्ञान। इसीलिये उपनिषद् का वाक्य है – “सा विद्या या विमुक्तये।” अर्थात विद्या वही जो मुक्ति प्रदान करे। भारत के बाहर कही भी शाश्वत या नित्य को जानने के लिए शास्त्र विकसित नहीं हुए। वहां केवल इस दृश्यमान जगत तक की सोच का विकास हुआ। जगत के निर्माता को जानने का उन्होंने कभी यत्न ही नहीं किया। यह पथप्रदर्शन केवल भारत में उपलब्ध है। इसलिए यहाँ उस नित्य का साक्षात्कार करने वाले अनगिनत साधक उत्पन्न हुए। विदेशियों ने भी जाना की ‘शुद्ध बुद्ध’ का साक्षात्कार करना है तो भारत में आना पडेगा और शास्त्रों को पढ़कर नित्य आचरण में उन्हें लाना होगा। इसलिए श्री मां (Mira Alfassa) फ्रांस से पुदुचेरी आयी, निवेदिता (Margaret Noble) इंग्लैंड से कोलकाता पहुंची। 7 फरवरी 2019 के प्रयाग के अर्ध कुम्भ में 9 अभारतियों को निर्मोही अनि अखाड़ा द्वारा महामंडलेश्वर घोषित किया गया। ज्ञान की प्राप्ति के लिए सब को भारत आना पडेगा, शास्त्रों को पढ़ना पडेगा। यह सब शास्त्र संस्कृत में है इसलिए संस्कृत पढ़नी पड़ेगी।

अभौतिक शास्त्रों के साथ साथ भौतिक शास्त्रों का भी विकास भारत में हुआ। भारत की भौतिक समृद्धि के यही कारक बने।

ये शास्त्र थे

कृषि, वाणिज्य, अर्थ (Political Science), धर्म (Law), वस्त्र, सौंदर्य प्रसाधन, गंध, वर्ण, शस्त्र, नौका, रथ, मार्ग; सेतु; वास्तु निर्माण (स्थापत्य – Civil Engineering), धातु, रसायन, खनन, भौतिक (Physics), वनस्पति, यन्त्र, खगोल, गणित, चिकित्सा (काष्ट औषधि, रसायन, शल्य, दैवव्यपाश्रय), वृक्षचिकित्सा, भाषा, काव्य, व्याकरण, शिक्षा, इत्यादि।

कलाएं थी

युद्ध, मूर्ति, चित्र, नृत्य, संगीत, नाट्य, वाद्य, पुष्प रचना, पाक (भोजन), अश्वकला, गज को पालना, शस्त्र चलाना, इंद्रजाल (जादू), वशीकरण (Hypnotism), वस्त्र सिलना, पशुपालन, गुप्त भाषा (Code Language), द्युत क्रीडा, आभूषण; खिलौने; पेय (आसव, सुरा) इत्यादि का निर्माण, मल्ल विद्या, व्यायाम, लिखना (भूर्ज पत्र, ताम्रपत्र, शिला लेख), सुतार, लोहार, चर्मकार, कुम्भकार, नापित (केशकर्तन), रत्नपरीक्षा इत्यादि। ये शास्त्र और कला से सम्बद्ध ग्रन्थ संस्कृत भाषा में निबद्ध है क्यों कि शिक्षा का माध्यम संस्कृत भाषा था। यद्यपि आक्रामकों ने उन्हें नष्ट किया या चुराया, फिर भी पर्याप्त संख्या में आज भी शास्त्रीय ग्रंथ उपलब्ध है।

निर्माणों और कलाओं का स्तर उत्तम था। इसलिए भारत से नौकाओं में माल भरकर विदेशों में जाता था और वहां से केवल स्वर्ण लेकर वणिक लौटते थे। मेनचेस्टर जैसे बन्दरगाहों में भारतीय वस्त्रों से लदी नौकाये कब आती है इसकी प्रतीक्षा होती थी। यही कारण था कि ईस्ट इंडिया कम्पनी का शासन आने तक भारत विश्व में सर्वाधिक समृद्ध देश था। अंग्रेजों ने पहले इन शास्त्रों को पाठ्यक्रम से हटाया और पश्चिम में विकसित शास्त्रों को पढ़ाने लगे। कलाओं के कारीगरों को समाप्त किया और अपना विधिशास्त्र लाया। भारत को आमूल चूल बदलने के प्रयास में वे कुछ मात्रा में सफल हुए। उसीका परिणाम है कि हम संस्कृत की उपयोगिता को नकारने लगे जिससे अपने ज्ञान प्राप्ति के मार्गों को भी हमने बंद कर दिया।

संस्कृत दिन के उपलक्ष में हम समाज को इस हानी से परिचित करायें। पुनः संस्कृत पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करे। राष्ट्र का पुनरुत्थान नकलची बनने से नहीं होगा। स्वावलंबन का नारा कोरोना के कारण भारत में गूंजने लगा है। वह केवल आर्थिक क्षेत्र तक सीमित न रहे। शिक्षा में भी उसका प्रवेश हो। अपने विश्व गुरुत्व के कारणों का बोध समाज को कराया जाय और उस स्थान की प्राप्ति के लिए आत्मविश्वास भरे उद्यम को करने के लिए ललकारा जाय। ईश्वरीय शक्ति का साथ हमेशा सत्य को खोजने वालों को प्राप्त होता है। इसलिए सफलताके बारे में किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए। हम भगीरथ की संताने है। हमें भीष्म प्रतिज्ञा करना आता है। उद्यम और साहस से विजयश्री को हम निश्चित प्राप्त करेंगे इस संकल्प के जागरण के लिए संस्कृत दिन मनायें। मुझे आशा है कि केवल योग दिन ही नहीं तो संस्कृत दिन भी विश्व पर छा जाएगा।

श्रीश देवपुजारी, अखिल भारतीय महामंत्री,
संस्कृतभारती.

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