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रामभक्त हनुमंत के जीवन के 2 रहस्य

हनुमान का विवाह भी हुआ था और उनका एक पुत्र भी था

– राघवेन्द्र शर्मा (पुरोहित)

विद्या, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम के तेजपुंज भक्त शिरोमणि काल जयी हनुमान हिंदुस्तान के सर्वाधिक पूजनीय देव है।इसकी बजह गोस्वामी तुलसीदास जी की वह उद्घोषणा है,जिसमें उन्होंने कहा कि “और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्व सुख करई।।” दूसरे देवों की ओर आकर्षित होने की आवश्यकता नहीं है।केवल हनुमान की आराधना से ही सर्व मनोकामनाओं की पूर्ति हो जाएगी। यही कारण रहा कि देश में सबसे अधिक मंदिर और सबसे अधिक उपासक महाबीर बजरंग बली के है।

अंजना नंदन के बल-बुद्धि और पराक्रम का डंका त्रेतायुग-द्वापरयुग से लेकर कलिकाल तक अनवरत बजता रहा है। सीताजी के वरदान “अजर-अमर गुन निधि सुत होऊ” से उन्हें चिरयौवन एवं अमरत्व की प्राप्ति हुई।मनीषियों के मतानुसार कलियुग में जहां-जहां भगवान श्रीराम की कथा-कीर्तन इत्यादि होते हैं, वहां हनुमानजी गुप्त रूप से विराजमान रहते हैं।सनातनधर्म के परमपूज्य व्रह्मचर्यव्रत धारण करने वाले कपीश्वर के जीवन की सभी कथाओं से हम वाकिफ है,किंतु उनके जीवन के दो रहस्य ऐसे भी है,जिनसे जन मानस अपरिचित है।

हनुमान जी का विवाह भी हुआ था और उनका एक पुत्र भी था।महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण में उनके पुत्र मकरध्वज का वर्णन आता है।महर्षि बाल्मीकि के अनुसार लंका दहन के पश्चात जब अपनी पूंछ की अग्नि को शांत करने के लिए हनुमानजी जब समुद्र पर पहुचे तो उनके शरीर से गिरे श्रमविंदु (पसीने की बूंदें) का पान एक मछली ने कर लिया था। श्रमविंदु के प्रभाव से गर्भवती हुई उस मछली ने मकरध्वज को जन्म दिया।जो हनुमानजी का पुत्र कहलाया।हनुमानजी की ही तरह मकरध्वज भी वीर, प्रतापी, पराक्रमी और महाबली थे।पाताल लोक के राजा अहिरावण ने उनकी वीरता को देखते हुए उन्हें पाताल पुरी का रक्षक नियुक्त कर दिया था।जब राम लक्ष्मण का अपहरण करके अहिरावण ले गया,तब उसकी खोज में हनुमानजी पाताल लोक पहुंचे वहां मकरध्वज से हनुमानजी का युद्ध हुआ।बलवान मकरध्वज की बीरता से प्रशन्न हनुमान ने जब उसके पिता का नाम जाना तब इस रहस्य का पता चला कि वह महावीर हनुमान का पुत्र है। अहिरावण की मृत्यु के बाद हनुमान ने मकरध्वज को पाताल लोक का अधिपति नियुक्त करते हुए उसे धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी थी।

क्या अपने कभी सुना है कि हनुमानजी का विवाह भी हुआ था ? आज तक यह बात लोगों से छिपी रही, क्योंकि लोग हिन्दू धर्म शास्त्रों को नहीं पढ़ते और जो पंडित या आचार्य शास्त्र पढ़ते हैं वे ऐसी बातों का जिक्र नहीं करते हैं। लेकिन यह हैरान कर देनेवाला सच है। हनुमानजी के विवाह का वर्णन पाराशर संहिता में किया गया है।

हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी हैं और आज भी वे ब्रह्मचर्य के व्रत में ही हैं, विवाह करने का मतलब यह नहीं कि वे ब्रह्मचारी नहीं रहे। हनुमानजी का विवाह परिस्थितिजन्य था।कथा के अनुसार हनुमानजी ने भगवान सूर्य को अपना गुरु बनाया और उनसे शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। सूर्य कभी रुक नहीं सकते थे, इसलिए हनुमानजी को सारा दिन भगवान सूर्य के रथ के साथ-साथ उड़ना पड़ता था और भगवान सूर्य उन्हें तरह-तरह की विद्याओं का ज्ञान देने लगे। लेकिन एक दिन हनुमानजी को ज्ञान देते समय सूर्य के सामने एक धर्मसंकट खड़ा हो गया।

क्योंकि अब जो ज्ञान और विद्याएं सिखाना शेष थीं,वह केवल विवाहित व्यक्ति को ही सिखाई जा सकतीं थी।अतः सूर्यदेव ने आगे की विधाओं को सिखाने से इंकार कर दिया,पर हनुमत पूर्ण विद्या लिये बगैर मानने को तैयार नहीं थे।हनुमान के समक्ष अजीव संकट था एक ओर ज्ञान एवं विद्याओं को सीखने की जिज्ञासा थी तो दूसरी ओर व्रह्मचर्य व्रत का संकल्प। ऐसी विषम परिस्थितियों ने सूर्यदेव को हनुमानजी की उलझन के निदान के लिये काफी चिंतन किया। गुरु शिष्य अजीब उलझन में थे,तभी सूर्यदेव की परम तपस्वी और तेजस्वी पुत्री सुवर्चला ने हनुमानजी की समस्या का हल निकाला।सुवर्चला ने कहा कि मैं आपके साथ विवाह करने के लिये तैयार हूं और विवाह के पश्चात में साधना में लीन हो जाऊंगी।जिससे आपका ब्रह्मचर्य व्रत भी भंग नहीं होगा और आपकी विद्या भी पूर्ण हो जाएगी।

इस तरह हनुमानजी का सूर्यपुत्री सुवर्चला के साथ विवाह हुआ,विवाह के पश्चात सुवर्चला तपस्या में लीन हो गई और पवनसुत ने संपूर्ण विधाओं का ज्ञान प्राप्त किया।साथही उनका अखंड व्रह्मचर्य व्रत भी पूर्ण रहा।हनुमत के साथ उनकी पत्नी सुवर्चला का मंदिर तेलंगाना के खम्मम जिले के येल्नाडु गांव में स्थित है। हैदराबाद से करीब 220 किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर में हनुमानजी की प्रतिमा के साथ उनकी पत्नी की प्रतिमा भी विराजमान है। मंदिर में दर्शन करने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। माना जाता है कि हनुमानजी के उनकी पत्नी के साथ दर्शन करने के बाद पति-पत्नी के बीच चल रहे सारे विवाद समाप्त हो जाते हैं और नूतन प्रेम का संचार होता है।

राघवेन्द्र शर्मा (पुरोहित)

हनुमान जी को मर्यादित एवं संयमित जीवन पसंद है। उनको अपना आराध्य मानने वालों को मर्यादाओं का पालन अवश्य करना होगा,नहीं तो उनकी भक्ति निरर्थक होगी।हनुमान जी की पसंद का चित्रण करते हुए तुलसीदास जी ने लिखा है “प्रभु चरित सुनिवे को रसिया।राम लखन सीता मन बसिया।।” अर्थात जिनका आचरण राम-लक्ष्मण और सीता जैसा मर्यादित और संयम से परिपूर्ण है,जो चरित्रवान है वही उन्हें पसंद है।वही उनका भक्त है,हनुनाम को चित्र नहीं चरित्र पसंद है।

– लेखक,महिला एवं बाल विकास विभाग में अधिकारी है तथा सनातन संस्कृति में गहरी आस्था रखते है

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