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नीला घोडा रा असवार म्हारा मेवाडी सरदार

बन बन भटके मान पर, देश धर्म अभिमान पर
राणा वीर प्रताप मिट गए, देखों अपनी आन पर।
उक्त पंक्तियॉं सार्थक हैं उस वीर के त्याग पर, शौर्य पर और बलिदान पर। मातृभूमि भारत और इसके वीर सपूतों की जितनी चर्चा की जाए कम है। इतिहास में उल्लेखित ऐसे कई चरित्र हैं जो अनंत प्रेरणा का स्त्रोत हैं और रहेंगे।

सिसोदिया वंश के इस कुल दीपक ने जब सन 1540 में महाराणा उदयसिंह और राणी जीवतकॅवर के यहॉं जन्म लिया तब किसी ने भी नहीं सोचा था कि उनका सपूत अपनी आन बान और शान की जगत में ऐसी मिसाल छोडेगा कि सदियों तक मेवाड तो क्या? पूरे हिन्दुस्थान में उसकी वीरता का यशोगान होता रहेगा। भारत के सभी राज्यों में मेवाड को सदैव ही शौर्य भूमि कहा जाता रहा है और इसी भूमि में जन्म लेने वाले प्रताप का नाम इतिहास में वीरता और दृढ संकल्प के लिये अजर अमर है। बचपन से ही वीरता की अनुपम मिसाल प्रस्तुत करने वाले महाराणा प्रताप बप्पा रावल के कुल की और राजपुताना घराने की अमूल्य धरोहर रहे। स्वाभिमान और राजपूती आन बान शान के वह पुण्य प्रतीक थे।

महाराणा प्रताप ने सन 1568 से 1597 तक की लगभग 29 वर्ष की अवधि तक मेवाड पर शासन किया और इस अवधि में उन्होने कभी भी मुगलों के सामने घुटने नहीं टेके। जब मारवाड, आमेर, बीकानेर और बूंदी के राजाओं ने अकबर की सार्वभौम सत्ता को स्वीकार कर लिया था तब महाराणा प्रताप हिन्दुत्व की उज्जवल ध्वजा को उठाकर शौर्य की मूर्ति बने अडिग रूप से खडे रहे। यहॉं तक कि उनके सगे भाई सागर भी उनके साथ विश्वासघात कर अकबर से जा मिले परन्तु महाराणा प्रताप ने कभी अकबर को बादशाह के रूप में स्वीकार नहीं किया।

हल्दीघाटी का युद्ध भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर है सन 1633 में राजपूती वीरों ने अपने रक्त से वहॉं कि भूमि के कण कण को मानो सींच दिया था और यही कारण है कि हल्दीघाटी जैसा पवित्र बलिदान स्थल आज सारे विश्व में नहीं है। अरावली पर्वत श्रेणियॉं उस वीरता और अदम्य पराक्रम की प्रत्यक्ष प्रमाण रहीं है और आज भी उस शौर्य व तेज की वीर गाथा का गौरव गान कर रही हैं। अपने 29 वर्षों के शासन काल में महाराणा प्रताप कई बार पराजित हुए लेकिन उन्होने अपने कुल के स्वाभिमान के साथ समझौता नहीं किया। चित्तौड का सिंहासन प्राप्त करते ही उन्होने भीलों को संगठित किया और सेना खडी की। जब युद्ध के दौरान अकबर की विशाल सेना के सामने महाराणा प्रताप के सैनिक शहीद होने लगे तब एक समय ऐसा भी आया जब राणा प्रताप को मुगलों ने घेर लिया तब मन्नाजी ने महाराणा के सिर पर रखे मेवाड के राजमुकुट को अपने सिर पर धारण किया और अकबर की सेना को भ्रमित कर महाराणा प्रताप को युद्ध भमि से दूर भेज दिया और मेवाड के इस कुलभूषण के प्राणों की रक्षा की।

महाराणा प्रताप के प्रिय घोडे चेतक का उल्लेख किये बिना यह चर्चा पूरी नहीं हो सकती। युद्ध भूमि से चेतक अपने स्वामी को सुरक्षित स्थान पर ले गया। महाराणा प्रताप वनवासी हो गए और महारानी, सुकुमार और राजकुमारी भी घास की रोटी पर जीवन यापन करने पर विवश हुए। इस संकट के समय भामाशाह ने आकर अपनी सारी सम्पत्ति महाराणा के चरणों में अर्पित कर दी और इतिहास के सबसे बडे दानवीर के रूप में अमर हो गए। महाराणा ने उस धन से पुनः सैन्य संगठन किया और कई दुर्गों पर अधिकार जमाया लेकिन उन्हे पुनः पराजित होना पडा और वन में ही रहना पडा। बप्पा रावल के कुल की अक्षुण्ण कीर्ति की उज्जवल पताका फहराने वाला यह वीर अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र कराने और उसे पुनर्वैभव पर ले जाने का स्वप्न देखते हुए मृत्यु का वरण कर गया। शौर्य की प्रतिमूर्ति महाराणा प्रताप धर्म और स्वाधीनता के लिये बलिदान हो गए।

उनकी जीवंत स्मृति आज भी प्रेरित कर रही है। महाराshritij purohitणा प्रताप की वीरता उनका कर्तृत्व और देशप्रेम संसार के सामने अचल भाव से विराजमान रहेगा और राष्ट्रधर्म पर बलिदान होने की प्रेरणा देता रहेगा।

एक गीत मेवाड में घर घर में गुनगुनाया जाता है –
नीला घोडा रा असवार म्हारा मेवाडी सरदार, औ राणा सुणता ही जा जो रे।
राणा थारी हुंकार सुणने अकबर धूजो जाए, हल्दी घाटी रंगी खून सूॅं, नालो बहतो जाए।

आज महाराणा प्रताप जयंति पर सिसोदिया वंश के इस अक्षुण्ण विजय स्तंभ को कोटि कोटि प्रणाम और पुण्य स्मरण।

– क्षितिज पुरोहित, मंदसौर

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