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मंदसौर के तैलिया तालाब के उत्थान से पतन तक का इतिहास: 484 बीघा में स्थापित था तैलिया तालाब

तैलिया तालाब के जीर्णोध्दार के लिए साहू तैली समाज के परिवारों ने दी थी 484 बीघा जमीन

इसलिए नाम पड़ा तैलिया तालाब

मंदसौर । तैलिया तालाब की उत्पत्ति को लेकर कोई संदेह नहीं है क्योंकि राजा-महाराजाओं का इतिहास बताता है कि तैलिया तालाब 484 बीघा में स्थापित था और तैलिया तालाब नाम इसलिए पड़ा कि इस तालाब की जमीन साहू तैली परिवारों द्वारा स्वर्गीय जीवाजी राव सिंधिया के पिता ग्वालियर के महाराजा श्री माधवराव सिंधिया (प्रथम) को देकर उनसे इस तालाब से जीर्णोध्दार का अनुरोध साहू तैली समाज द्वारा किया गया था ।

बीसवी शती में ईस्वी सन् 1911 (विक्रम संवत 1968)  ग्वालियर स्टेट के महाराजा श्रीमंत जीवाजीराव के पिता श्री माधवराव सिंधिया (प्रथम) ने इस तालाब के जीर्णोध्दार का आदेश दिया था । इस संबंधी शिलालेख सन् 2014 तक तैलिया तालाब पर मौजूद था, इस शिलालेख में उल्लेख था कि तैलिया तालाब के जीर्णोध्दार पर 16 हजार 802 रूपये व्यय हुए थे एवं जलग्रहण क्षेत्र के लिए 484 बीघा भूमि सुरक्षित की थी इसके जलाशय की क्षमता 77 लाख 2 हजार घनफीट थी । महाराजा माधवराव सिंधिया (प्रथम) ने उस समय तालाब का नाम तैलिया तालाब इसलिए रखा था कि यह जमीन साहू तैली समाज के परिवारों से संबंधित थी ।

जिस समय तैलिया तालाब के निर्माण की भावना/योजना कौंधी उस समय यह इलाका पूरी तरह जनशून्य था । दौलतपुरा ग्राम को बेचिराग मौजा माना जाता था । मुल्तानपुरा एवं भुनियाखेड़ी में बस्ती थी । मंदसौर के नरसिंहपुरा में भी बस्ती थी । मंदसौर ग्राम जुड़ा हुआ था । दौलतपुरा पथरिला इलाका था जिस पर लघु पर्वती की श्रृंखला फैली हुई थी । इसमें स्लेट पेंसिल पत्थर प्रचुरता से पाया जाता था, लेकिन जब स्लेट पेंसिल की खोज नहीं हुई थी । नीमच-महू मार्ग का निर्माण भी पूरा हो चुका था, अन्य सर्वत्र पथरीला इलाका, नग्न शैलशिखर तथा कृषि या उजागड़ भूमि में हजारों एकड़ का क्षेत्र फैला हुआ था । एक नाला बोतलगंज की ओर से इस इलाके में आता था जो वर्षा में पूर्णतः जलपूरित हो जाता था । भीमलोद मगरे से वर्षा का पानी मैदानों में उतरता था, इसके अन्य क्षेत्र में स्थित पहाड़ियों में कई प्राकृतिक जलखण्ड निर्मित कर रखे थे । अधिकांश जल मगरों से उतरकर मैदान में लुप्त हो जाता था । इस पूरे इलाके की स्थिति एक तालाब के निर्माण के अनुकूलता को जन्म देती थी ।

अब ऐसी स्थिति में इस 484 बीघा के तालाब की भूमि के मालिक साहू तैली समाज के जो पास के ही राजस्थान के प्रतापगढ़ से मंदसौर निवास करने आए थे । साहू तैली समाज के यह भूमि स्वामी समृध्द परिवार में गिने जाते थे तथा ग्वालियर रियासत में यह समाज ऐसा काम करना चाहता था जिससे समाज का नाम पीढ़ियों तक चलता रहे और साहू तैली समाज ने इन तमाम परिस्थितियों को देखकर तालाब के निर्माण की योजना बनाई थी और देवडूंगरी माताजी का मंदिर भी तैली समाज का एक धार्मिक स्थल के रूप में माना जाता है । यह मंदिर रेवास देवड़ा रोड़ के मार्ग दौलतपुरा पर स्थित है, इसे पूरा साहू तैली समाज अपनी आस्था का केन्द्र मानता था और मानता है, उनके मांगलिक कार्यों के समय देवडूंगरी माताजी की पूजा अर्चना प्रारंभ कर ही यह समाज मांगलिक कार्य प्रारंभ करता था । साथ ही तैलिया तालाब के आसपास भी कुछ लघु देव स्थान मिलते है इनकी पूजा भी मंदसौर के तैली समाज के परिवारों द्वारा आज भी की जाती है ।  साहू तैली समाज द्वारा अपने खेतों पर कुलदेवी देवताओं के देव स्थान बना रखे थे इनमें से एक बड़े अंश में भूमि 484 बीघा तैलिया तालाब के निर्माण के लिए साहू तैली परिवार द्वारा समर्पित की गई थी ।

झरने की ऊंचाई 18 फीट और लंबाई 60 फीट रखी गई थी

इन तमाम तथ्यों को कसौटी पर कसते हुए तैलिया तालाब के निर्माण पर सन ईस्वी सन 1892 माना गया है । ग्वालियर राजवंश के अधिपति श्रीमंत ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रदादा (श्री माधवराव सिंधिया के पिता श्री जीवाजी राव सिंधिया एवं उनके पिता श्री माधवराव सिंधिया (प्रथम) ) ग्वालियर स्टेट के शासक थे । उनने अपने कार्यकाल में इस तालाब का जीर्णोध्दार करवाया था । उनके निर्देश पर अभियांत्रिक यहां पहुंचे थे । ईस्वी सन् 1911 में इस तालाब की मरम्मत पूर्ण हुई थी, अभियांत्रिक ने टूटे हुए बांध की दीवाल का विस्तार किया है तथा एक ओर जलनिकास का निर्माण किया जो आज भी मौजूद है । इस झरने की ऊंचाई 18 फीट रखी थी तथा इसकी लंबाई 60 फीट रखी थी । यह निकासी पूर्णतः काले बद्दे से निर्मित हुई थी, दोनों ओर जल के आवेग को नियंत्रित रखने के लिए पक्की दिवालें बनाई गई थी और तालाब को सुरक्षित बनाकर इस तालाब को मंदसौर की जीवनधारा में बदला गया था ।

तालाब की मरम्मत के शिलालेख पर अंकित थी संपूर्ण जानकारी

सन् 2014 तक इस तालाब की मरम्मत का शिलालेख तालाब पर मौजूद था, उस शिलालेख पर उल्लेख किया गया था कि तालाब का समुद्र तल से अधिकतम जलमग्न स्तर 1459.20 फीट तथा ऊंचाई 1452.60 फीट है निम्नतम जल स्तर 1440.50 फीट पर स्थित किया गया था । 8 फीट पानी का उपयोग किया जाता था और 205 फीट पानी छोड़ दिया जाता था । नहर द्वारा 240 हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई होती थी । डूब की भूमि 337 एकड़ थी । पानी की कुल मात्रा 52.70 मिलियन घनफुट रहती थी ।

नगर की जनसंख्या बढ़ने के बाद कलेक्टरों ने किया था तालाब को पेयजल के लिए सुरक्षित

वैसे तैलिया तालाब के निर्माण के समय मंदसौर की जनसंख्या केवल 5 से 7 हजार थी । मंदसौर नगर में ही इतने कुएं और कुण्ड बने हुए थे कि यहां कोई पेयजल संकट नहीं था । तैलिया तालाब का पूरा इलाका घने जंगल के रूप में था और इस जंगल को पार कर आसपास के गांव बुगलिया, रेवास, नौगांवा आदि ग्रामों में लोग जाते थे, न सड़कें थी, न मार्ग बने हुए थे, पगडंडीयां एवं गाड़ी गडार थे जिनसे लोग मंदसौर आना-जाना करते थे । तालाब में गई डूब की भूमि का ग्वालियर रियासत के साथ अनुबंध था कि नहरी तथा जलग्रहण दोनों क्षेत्रों में सिंचाई के लिए पानी का उपयोग किया जाएगा । डूब की जमीन के खाली होने पर खेती के आश्रय से भूमि का उपयोग किया जा सकेगा । इस प्रावधान के अनुसार प्रारंभ से ही खाली होने वाली भूमि में खेती होती रही है, वैसे भी ऐसी भूमि में जल की कभी कमी नहीं होती है ।

धीरे-धीरे मंदसौर नगर का विस्तार हो गया और बढ़ते-बढ़ते जनसंख्या मंदसौर नगर की एक लाख के ऊपर का आंकड़ा छूने लगी और इस कारण पेयजल का अभाव होने लगा और उसके बाद से तात्कालीन कलेक्टरों ने तैलिया तालाब का जल पेयजल हेतु विधिवत सुरक्षित किया जाने के लिए प्रतिवर्ष आदेश जारी करते रहे ।

20वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में हुआ तैलिया तालाब के पतन का दौर प्रारंभ

20वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में तैलिया तालाब के पतन का दौर प्रारंभ हुआ । तीन-चार वर्षों तक कम वर्षा के अभाव में तालाब पूरा नहीं भर पाया और इसका अनुचित लाभ उठाते हुए तैलिया तालाब में खेती करने वालों ने तैलिया तालाब को घेरना प्रारंभ किया । मनमाने ढंग से राजस्व रिकॉर्ड में तैलिया तालाब की जमीनों के नाम पटवारियों ने चढ़ा दिए और उसके बाद तैलिया तालाब में आने वाले जल स्त्रोत के मार्गों को खेती के लालच में गतिरोध कर दिया । यहां तक कि तालाब में खेती के लिए भूमि बनाए रखने के लिए तालाब के जलसंग्रहण क्षेत्र के ढलान को भू असंतुलित कर दिया।

जलसंग्रहण क्षमता बढ़ाने के नाम से सिंचाई विभाग का गलत निर्णय

सन् 2011 के पूर्व तैलिया तालाब सिंचाई विभाग वर्तमान मेंजल संसाधन विभाग के अधीनस्थ था । ऐसी स्थिति में सिंचाई विभाग के अधिकारियों ने अपने पदों का दुरूपयोग कर तथा अवैध उत्खनन करने वालों से सांठगांठ कर ली एवं सूखे के समय तालाब की जल संग्रहण क्षमता बढ़ाने के नाम पर इसके पेंदे से काली मिट्टी निकालकर निःशुल्क ले जाने देने की प्रशासनिक स्वीकृति दिलवा दी । फलतः तालाब के पेंदे की जल रोकने की स्थिति का हृास हो गया । और देखते ही देखते तैलिया तालाब की काली मिट्टी आसपास के ग्रामीण इलाकों से लगाकर सीतामऊ तक अवैध उत्खनन वाले ले गए । यहां तक कि एक भू-माफिया के पुत्र ने इस निःशुल्क काली मिट्टी को 1200 से लगाकर 1500 रूपये एवं 1700 रूपये प्रति डम्फर के हिसाब से बेची…!

यही नहीं देखते ही देखते सिंचाई विभाग के अधिकारियों की सांठगांठ से कॉलोनाईजर्स भी पीछे नहीं हटे । उनने भी नाला मार्गों पर अवैध रूप से भूखण्डों का विक्रय कर दिया । तैलिया तालाब के आवक में जो बड़े-बड़े नाले थे जिन पर भू-माफियाओं ने साजिश रचते हुए सिंचाई विभाग के अधिकारियों एवं राजस्व विभाग के पटवारी, गिरधावर से मिलकर जो खेल खेला है, वह खेल इस प्रकार था कि नालों, तैलिया तालाब में आने वाले जल स्त्रोत पर भू-माफियाओं ने प्लाट काट दिए थे उनकी रजिस्ट्रीयां कर दी थी, उन प्लाटों को साबूत बनाए रखने के लिए धीरे-धीरे तैलिया तालाब में आने वाले हर आवक मार्गों को संकरा बनाते हुए तैलिया तालाब की आवक को लुप्त कर दिया था । इन्हीं वर्षों में तैलिया तालाब के किनारों को छुता हुआ बायपास तैयार हुआ, बायपास निर्माण के अनुबंध में कुल दस पुलों के निर्माण किए जाने का प्रावधान था लेकिन ठेकेदार ने इस क्षेत्र में अपनी शर्तों को पूर्ण नहीं किया, इस कारण वर्षा का पानी विभाजित हो गया और बरसात का पानी तैलिया तालाब में चारों तरफ से आना बंद हो गया।

पांच षडयंत्रों के कारण तैलिया तालाब की जल संग्रहण क्षमता एकदम घट गई

बीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में इस ऐतिहासिक धरोहर तैलिया तालाब को स्वार्थी तत्वों द्वारा नष्ट करने का एक योजनाबध्द षडयंत्र रचा गया जिसमें कृषि लाभ को बनाए रखने के लिए तैलिया तालाब की भूमि के ढलान को असंतुलित बनाए रखा, जल के ठहराव को रोके रहने वाले तैलिया तालाब के पेंदे को विकृत करने का योजनाबध्द षडयंत्र रचा, तैलिया तालाब के आसपास अवैध कॉलोनियों के निर्माण में जल स्त्रोत के मार्गों को अवरूध्द कर दिया, अवैध कॉलोनियों के मल-मूत्र, गंदा पानी आदि निकास को सीधा तैलिया तालाब में डाल दिया और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि बायपास निर्माण का अनुबंध में शर्तों का पालन ठेकेदार ने नहंी किया और तैलिया तालाब में आने वाले जल के स्त्रोत एवं नालों के स्त्रोत को पूर्ण रूप से रोक दिया। इन पांचों षडयंत्रों के कारण तैलिया तालाब की जल संग्रहण क्षमता एकदम घट गई । तैलिया तालाब की दुर्दशा ऐसी हो गई कि भरपूर बारिश होने पर भी यह खाली रहने लगा ।

नगर पालिका ने भी खेला काली मिट्टी का खेल

उसी कड़ी में जब 2011 में तैलिया तालाब मंदसौर नगर पालिका को सुपुर्द हुआ तो मंदसौर नगर पालिका ने तैलिया तालाब गहरीकरण के नाम से काफी दुकानें चलाई । अंत में जब इसकी शिकायत हुई थी कि तैलिया तालाब का पेंदा खोद दिया गया है और अब काली मिट्टी जो तालाब के जल को रोकती थी वहां पत्थर आ चुके है तब कलेक्टर ने जांच के आदेश दिए थे और तात्कालीन सिंचाई विभाग (जल संसाधन विभाग) के कार्यपालन यंत्री खरे ने एक रिपोर्ट बनाई थी और वह रिपोर्ट खरे ने कलेक्टर को भेजी थी जिसमें तैलिया तालाब के गहरीकरण पर पूर्ण रूप से रोक लगाने की बात कही थी ।

विधायक स्वर्गीय श्री पुरोहित की बुगलिया डायवर्शन योजना लाई तैलिया तालाब में नई जान

तब मंदसौर के विधायक स्वर्गीय श्री ओमप्रकाश पुरोहित ने इस तैलिया तालाब की चिंता की और उन्होंने तैलिया तालाब को भरने के लिए बुगलिया नाले से एक नहर की स्थापना करवाई और इस ऐतिहासिक धरोहर जो आज तैलिया तालाब जो पानी से भरा दिखाई दे रहा है यह देन स्वर्गीय ओमप्रकाश पुरोहित विधायक की है । यहां यह उल्लेख करना भी आवश्यक है कि आज भी स्वर्गीय ओमप्रकाश जी पुरोहित द्वारा स्थापित कराई गई बुगलिया डायवर्शन योजना जिससे तैलिया तालाब भरता है उस डायवर्शन पर भी भू-माफियओं की निगाह है और उस डायवर्शन पर भी अतिक्रमण आदि एवं डायवर्शन नाले के आसपास निर्माण कार्य भू-माफियाओं ने प्रारंभ कर दिए है ।

मंदसौर की जनता को है कलेक्टर श्री मनोज पुष्प से उम्मीद

मंदसौर की जनता कलेक्टर श्री मनोज पुष्प से यह उम्मीद करती है कि उन्हें 484 बीघा का तालाब जो विरासत में मिला हुआ है वह उन्हें नापकर दे दिया जाए और यह नपती अगर संवत् 95 के नक्शे से हुई तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा ।

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